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Monday, March 2, 2026
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Gandhinagar : ‘गेट्स फाउंडेशन’ ने गुजरात बायोटेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम को महिलाओं के भारी मासिक धर्म रक्तस्राव से संबंधित रिसर्च के लिए 1 करोड़ रुपए से अधिक की सहायता दी

गेट्स फाउंडेशन राज्य सरकार की ओर से संचालित गुजरात बायोटेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी (जीबीयू) की रिसर्च टीम को महिलाओं को पीरियड्स यानी माहवारी के दौरान होने वाले भारी रक्तस्राव पर रिसर्च करने के लिए करीब 1.3 करोड़ रुपए की सहायता देगा।

गेट्स फाउंडेशन की फंडिंग के अंतर्गत जीबीयू की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रोहिणी नायर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ‘हैवी मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग-एचएमबी’ यानी महिलाओं के पीरियड्स के दौरान होने वाले भारी रक्तस्राव के लिए यानी आरएनए-आधारित यानी राईबोन्यूक्लिक एसिड पर आधारित डायग्नोस्टिक एवं उपचार के लिए संसाधन विकसित करने के लिए कार्य करेगी। ये संसाधन सस्ते, स्केलेबल यानी विस्तार करने में सक्षम और कम आक्रामक होंगे।

विशेषकर, दूरदराज के इलाकों में महिलाओं के लिए जल्दी निदान, व्यक्तिगत उपचार और मेंस्ट्रुअल हेल्थ मैनेजमेंट में सुधार लाने के उद्देश्य के साथ इस प्रोजेक्ट को ‘गेट्स फाउंडेशन ग्रैंड चैलेंजेस सपोर्ट’ के तहत स्वीकृत किया गया है। गेट्स फाउंडेशन ने इसके लिए लगभग 1.3 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता मंजूर की है।

डॉ. रोहिणी नायर ने इस विषय में बताया कि गेट्स फाउंडेशन ने फरवरी, 2025 में ‘ग्रैंड चैलेंजेस’ फंडिंग कॉल शुरू किया था, जिसमें महिलाओं के स्वास्थ्य से संबंधित गंभीर, लेकिन अक्सर उपेक्षा का शिकार रहने वाली समस्या हैवी मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग के निवारण के लिए अभिनव दृष्टिकोण आमंत्रित किए गए थे। फाउंडेशन मूल्यांकन के लिए दो चरणों की प्रक्रिया का पालन करता है, जिसकी शुरुआत कंसेप्ट नोट या लेटर ऑफ इंक्वायरी (एलओआई) से होती है। इसके बाद शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों से संपूर्ण प्रपोजल मंगाया जाता है, ताकि वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और वैज्ञानिक सावधानी या सटीकता बनी रहे। भारी मासिक धर्म रक्तस्राव की समस्या के निवारण और इस संबंध में जागरूकता फैलाने के लिए जीबीयू की ओर से महिलाओं को भी आमंत्रित किया जाएगा, ताकि यह अन्य महिलाओं के लिए मददगार साबित हो सके।

यह रिसर्च-स्टडी अहमदाबाद की इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिजीज एंड रिसर्च सेंटर (आईकेडीआरसी) के ऑब्स्टेट्रिक्स (प्रसूति रोग) और गायनेकोलॉजी (स्त्री रोग) विभाग की डीन एवं हेड डॉ. रोहिना अग्रवाल के सहयोग से की जाएगी।

रिसर्च के अंतर्गत डॉ. अग्रवाल मरीजों की पहचान और चिकित्सा मूल्यांकन में मुख्य भूमिका निभाएंगी, जबकि डॉ. नायर की लेबोरेटरी महिलाओं के स्वास्थ्य रिसर्च पर ध्यान केंद्रित करेंगी। वे, विशेषकर गर्भ धारण करने में बार-बार होने वाली असफलता (RIF – Repeated Implantation Failure) और एंडोमेट्रिओसिस पर एचएमबी के लिए आरएनए-आधारित किफायती और न्यूनतम आक्रामक संसाधन विकसित करने पर सक्रिय रूप से कार्य करेंगी।

डॉ. नायर ने आगे कहा कि आज भारी माहवारी रक्तस्राव (एचएमबी) से दुनिया भर की लाखों महिलाएं प्रभावित हैं। इसके चलते एनीमिया, कार्यक्षमता में कमी, लंबे समय तक थकान महसूस करना और जीवन की गुणवत्ता कमजोर पड़ने जैसी समस्याएं खड़ी होती हैं। इसका प्रभाव उन इलाकों में अधिक गंभीर है, जहां समय पर डायग्नोसिस और प्रभावी उपचार की कम सुविधाएं हैं। यह प्रोजेक्ट हार्मोनल इन्ट्रा-यूरेटाइन डिवाइस जैसे उपचार की स्वीकार्यता और पहुंच बढ़ाने के रास्तों की भी खोज करेगा। एचएमबी के व्यापक प्रसार के बावजूद, अभी इसके पीछे के जैविक कारणों के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह केवल वृद्ध महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि युवा पीढ़ी में भी देखने को मिलता है। हालांकि, हमारे सामाजिक परिवेश के कारण महिलाएं खुलकर बात नहीं कर पातीं और आम तौर पर दर्दनिवारण दवाइयां लेकर अपना काम चलाती हैं।

इस समस्या के बारे में अधिक जानकारी देते हुए डॉ. नायर ने कहा कि एबनॉर्मल यूटेराइन ब्लीडिंग यानी असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव, जिसका एचएमबी एक विषय है, वह विभिन्न कारकों के कारण होता है। जिनमें स्ट्रक्चरल एबनॉर्मलिटीज जैसे कि पोलिप्स, एडिनोमायोसिस, फाइब्रोइड्स और मैलिग्नेंसी-कैंसर शामिल हैं। वहीं, नॉन-स्ट्रक्चरल कारकों में ब्लीडिंग डिसऑर्डर यानी रक्तस्राव विकार, ओव्यूलेटरी और एंडोमेट्रियल डिसफंक्शन का सामवेश होता है।

इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य सिंगल-सेल आरएन सिक्वेंसिंग का उपयोग करके एचएमबी के सेलुलर और मॉलिक्युलर कारकों को मैप करना है, जिससे कि एंडोमेट्रियल माइक्रोएन्वायर्नमेंट का व्यापक डेटा संग्रह तैयार किया जा सके। उम्मीद है कि इस कार्य से मिलने वाली जानकारी असामान्य मासिक रक्तस्राव से जुड़े मुख्य पाथ-वे यानी मार्ग और बायोमार्कर्स की पहचान करेगी।

गुजरात बायोटेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के डीन रिसर्च प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने कहा कि जीबीयू इस उपलब्धि को वैश्विक महिला स्वास्थ्य रिसर्च में भारत के योगदान के रूप में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानता है और प्रभावशाली एवं विज्ञान-आधारित रिसर्च को प्रोत्साहन देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।

एचएमबी पर रिसर्च प्रोजेक्ट का मुख्य फोकस एरिया एचएमबी यानी भारी मासिक रक्तस्राव की फंडामेंटल बायोलॉजी की समझ को आगे बढ़ाना और कम सुविधाओं वाले इलाकों में महिलाओं में इस रोग के फैलाव, प्रभाव और स्त्री रोग स्वास्थ्य तथा जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन करना है।

इसके अलावा, ध्यान केद्रित करने के अन्य क्षेत्रों में, एचएमबी की जांच के लिए संशोधित पद्धतियां विकसित करना और उन्हें प्रमाणित करना तथा स्टैंडर्डाइज्ड रिसर्च प्रोटोकॉल स्थापित करना और कम सुविधाओं वाले इलाकों में एचएमबी के कारणों की पहचान करने के लिए अत्याधुनिक डायग्नोस्टिक्स तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टेक्नोलॉजी का उपयोग करने के साथ-साथ उपचार की प्रभावशीलता, स्वीकार्यता और उपचार तक पहुंच बढ़ाने के रास्तों का मूल्यांकन करना शामिल हैं।

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