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Monday, March 2, 2026
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Gandhinagar : आगामी VGRC, राजकोट में विश्व मंच पर चमकेगी टंगालिया हस्तकला की पहचान, टंगालिया कारीगरों की कला और उपलब्धियाँ होंगी प्रमुख आकर्षण

गांधीनगर, 4 दिसम्बर 2025: माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मंत्र “हर घर स्वदेशी, घर-घर स्वदेशी” से प्रेरित होकर राजकोट के मारवाड़ी विश्वविद्यालय में होने वाला वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र के औद्योगिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवसरों को व्यापक मंच पर प्रदर्शित करेगा।

टंगालिया कला, गुजरात की लगभग 700 वर्ष पुरानी हस्तकरघा परंपरा है, जो अपने दानेदार पैटर्न के लिए जानी जाती है। सुरेंद्रनगर के डांगासिया समुदाय के कारीगर इस कला को आज भी बेहद निपुणता से संरक्षित किए हुए हैं। इसमें अतिरिक्त वेफ्ट धागों को वार्प धागों पर बारीकी से लपेटकर सुंदर ज्यामितीय डिज़ाइन बनाए जाते हैं। इसकी अनोखी तकनीक और सांस्कृतिक महत्व के कारण टंगालिया को भौगोलिक संकेत (GI) का भी दर्जा मिला है, जो इसकी विशिष्टता और परंपरा की रक्षा करता है।

कभी विलुप्त के कगार पर पहुँच चुकी यह प्राचीन कला आज फिर नई पहचान बना रही है। आज बदलते समय में दुनिया में पुरातन, हस्त निर्मित और सांस्कृतिक रूप से जुड़ी वस्तुओं की बढ़ती मांग ने इसे दोबारा जीवंत कर दिया। आज हस्त निर्मित उत्पादों की वैश्विक लोकप्रियता के चलते गुजरात के टंगालिया कारीगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बना रहे हैं। इस पुनर्जीवन के प्रमुख सूत्रधार हैं लवजीभाई परमार, जो पारंपरिक टंगालिया बुनाई के माहिर कलाकार हैं। भारत सरकार ने वर्ष 2025 में उनके योगदान को मान देते हुए उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया है।

लवजीभाई परमार पिछले चार दशकों से इस प्राचीन कला के संरक्षण और संवर्धन में जुटे हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक कॉमन फैसिलिटी सेंटर बनाया है जहाँ युवा कारीगरों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और बाज़ार से जुड़ने में मदद मिलती है। देशभर में प्रदर्शनियाँ आयोजित कर और विभिन्न विक्रेताओं से जुड़कर उन्होंने इस कला में नई ऊर्जा भर दी। इसी कारण उन्हें “टंगालियानो त्राणहार” यानी टंगालिया कला के संरक्षक के रूप में भी जाना जाता है।

टंगालिया कला की वैश्विक लोकप्रियता का एक उदाहरण सुरेंद्रनगर के कारीगर बलदेव मोहनभाई राठौड़ हैं। उन्होंने हॉलीवुड फिल्म “F1” के लिए अभिनेता ब्रैड पिट द्वारा पहनी गई टंगालिया शर्ट तैयार की थी। यह उपलब्धि गुजरात की इस प्राचीन कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाला महत्वपूर्ण क्षण बनी। प्रधानमंत्री के मार्गदर्शक मंत्र “विकास भी, विरासत भी” को साकार करने में टंगालिया बुनाई की यह परंपरा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह गुजरात की सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक गौरव का मजबूत प्रतीक है।

आगामी वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस इस सहयोग को और आगे बढ़ाएगी। इसमें संयुक्त उद्यमों, कौशल विकास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए अवसर मिलेंगे। कच्छ और सौराष्ट्र को विशेष महत्व देने से स्पष्ट होता है कि सरकार के लिए औद्योगिक विकास के साथ-साथ सामुदायिक सशक्तीकरण, कौशल उन्नयन और पारंपरिक आजीविकाओं का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आगामी वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेन्स वैश्विक निवेशकों, स्थानीय उद्यमियों, कारीगरों और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को एक ही मंच पर लाएगी। यह आयोजन गुजरात की आर्थिक शक्ति और उसकी सांस्कृतिक जड़ों, दोनों का उत्सव बनेगा। इसका संदेश साफ होगा कि विकास तभी सार्थक है जब वह समुदायों को आगे बढ़ाए, विरासत को सुरक्षित रखे और लोगों में गर्व की भावना पैदा करे।

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