भारत माता का मंदिर देशप्रेम और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है, जो भारत को एक मां के रूप में पूजने की भावना से जन्मा है; वाराणसी (1936) और हरिद्वार (1983) के मंदिर प्रमुख हैं, जो विभिन्न धर्मों के समन्वय और शहीदों को समर्पित हैं, जिनमें काशी विद्यापीठ के मंदिर में अखंड भारत का नक्शा है, जबकि हरिद्वार का मंदिर कई मंजिलों में शूरवीरों, संतों और विभिन्न देवताओं को दर्शाता है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
अवधारणा का उदय: ‘भारत माता’ की अवधारणा 19वीं सदी के अंत में बंगाल में विकसित हुई, जिसे आनंदमठ उपन्यास (1882) और अवनिन्द्रनाथ टैगोर के चित्र (1904) से लोकप्रियता मिली, जिसमें उन्हें देवी दुर्गा के रूप में दर्शाया गया था.
स्वतंत्रता आंदोलन: यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय एकता और देश प्रेम की भावना को जगाने का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया.
प्रमुख मंदिर और उनका इतिहास:
भारत माता मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश):
स्थापना: स्वतंत्रता सेनानी डॉ. शिव प्रसाद गुप्त द्वारा 1930 के दशक में निर्मित और 1936 में महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटन किया गया.
विशेषता: इसमें किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं, बल्कि संगमरमर पर उकेरा गया अखंड भारत का त्रिआयामी भौगोलिक नक्शा है, जो देश की एकता का प्रतीक है.
भारत माता मंदिर, हरिद्वार (उत्तराखंड):
संस्थापक: स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज, जिन्होंने भारत माता को अपनी पहली आराध्या देवी माना.
निर्माण: 1983 में हुआ.
संरचना: 180 फीट ऊंचा, सात मंजिला मंदिर है, जिसमें विभिन्न मंजिलों पर स्वतंत्रता सेनानियों, मातृशक्तियों (मीराबाई, लक्ष्मीबाई), संतों (तुलसीदास, विवेकानंद), विभिन्न धर्मों के मूल मंत्र (जैसे सिख, ईसाई, इस्लाम), और देवी-देवताओं (दुर्गा, विष्णु, शिव) की प्रतिमाएं हैं.
अन्य मंदिर:
कटघोरा, छत्तीसगढ़: 1952 में स्थापित यह मंदिर राष्ट्रीय पर्वों पर खुलता है और अखंड भारत के नक्शे के रूप में बना था.
बरेली, उत्तर प्रदेश: नाथनगर में स्थित एक अन्य मंदिर भी है, जहाँ खाटू श्याम बाबा और अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है l
भारत माता मंदिर भारत की विविधता में एकता, राष्ट्रीय गौरव और बलिदान की भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो प्राचीन भारतीय परंपराओं और आधुनिक राष्ट्रवाद का संगम हैं l यूं तो हम सभी भारतीय भारत माता की जय वर्षों से बोलते आ रहे हैं परंतु आजादी के दशकों बाद भी यह एक औपचारिकता ही लगता है क्योंकि आज भी देश की राजधानी दिल्ली में भारत की विविधता में एकता, राष्ट्रीय गौरव और बलिदान की भावना का प्रतिनिधित्व करने वाली विचारधारा का कोई मूर्त रूप में विराट दिव्य भव्य भारत माता का मंदिर नहीं बन सका है l अब समय आ गया है कि सभी भारतवासी अपनी राष्ट्र के प्रति भावनाओं को मूर्त रूप दें और सरकार भी इसमें यथा संभव सहयोग देकर इसे पूर्ण करने में अपनी जिम्मेदारी निभाएं
REPOTER : हेमंत वर्मा , राजनांदगांव छत्तीसगढ़


