छत्तीसगढ़ में जल संकट और गिरते भू-जल स्तर के बीच सरकार जल संचयन और भू-जल रिचार्ज को लेकर लगातार योजनाएं बना रही है। हालांकि राज्य की भौगोलिक और भू-वैज्ञानिक परिस्थितियां इन प्रयासों के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं। यह कहना है राज्य सिंचाई एवं जल समिति के पूर्व सदस्य अशोक चौधरी का जिन्होंने अपने लंबे अनुभव के आधार पर छत्तीसगढ़ में भू-जल संचयन की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
श्री चौधरी ने कहा कि छत्तीसगढ़ शासन जल संचयन को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इसके लिए वृहद कार्यक्रम भी बनाए गए हैं। लेकिन उनका व्यक्तिगत और व्यावहारिक अनुभव बताता है कि राजनांदगांव सहित छत्तीसगढ़ के कई जिलों में जमीन के नीचे पानी को संचित करना आसान नहीं है। उन्होंने बताया कि यहां जमीन के नीचे लाल भुरभुरी पत्थर की परत पाई जाती है। जैसे ही इस पर पानी गिरता है पत्थर की सूक्ष्म दरारें बंद हो जाती हैं जिससे पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता। यही कारण है कि वर्षा जल का अपेक्षित भू-जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। श्री चौधरी ने अपने तर्क को मजबूत करने के लिए राजनांदगांव के सर्किट हाउस के पास स्थित रानी सागर तालाब का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यह तालाब पिछले डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में है और हमेशा लबालब भरा रहता है।

इसके बावजूद सर्किट हाउस परिसर में किए गए 8 बोरिंग प्रयास पूरी तरह असफल रहे। किसी भी बोर से पानी नहीं निकला। इससे यह स्पष्ट होता है कि जहां ठोस पत्थर नहीं है, वहां लंबे समय तक जमा पानी भी भू-जल को रिचार्ज नहीं कर पाता। उन्होंने आगे बताया कि शिवनाथ नदी के किनारे भी बोरिंग के प्रयास सफल नहीं हो सके। जब सैकड़ों वर्षों से संचित नदी का पानी भी ग्राउंडवाटर को रिचार्ज नहीं कर पाया तो केवल बरसाती पानी से यह उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। श्री चौधरी के अनुसार जिन इलाकों में लाइमस्टोन या सैंडस्टोन की परतें हैं वहां पत्थरों में मौजूद दरारों के कारण पानी जमीन के भीतर आसानी से जा सकता है। उन्होंने बताया कि राजनांदगांव से लगभग 10 किलोमीटर दूर भानपुरी गांव और 17 किलोमीटर दूर अर्जुनी गांव में लाइमस्टोन और सैंडस्टोन की मौजूदगी के कारण बोरिंग सफल रही है। अन्य राज्यों की तरह मॉडल लागू करना होगा सोच-समझकर उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में जिस आसानी से भू-जल रिचार्ज हो जाता है वैसी परिस्थितियां छत्तीसगढ़ में नहीं हैं। इसलिए अन्य राज्यों के मॉडल को सीधे यहां लागू करना उचित नहीं होगा। अशोक चौधरी ने सुझाव दिया कि पूरे राज्य में भू-वैज्ञानिक सर्वे कर यह चिन्हित किया जाए कि कहां ठोस पत्थर हैं और कहां भू-जल रिचार्ज की वास्तविक संभावना है। उन्हीं क्षेत्रों में ठोस और वैज्ञानिक योजना के तहत कार्य किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि बिना जमीन की प्रकृति को समझे योजनाएं लागू की गईं तो शासन का पैसा, प्रयास और मेहनत व्यर्थ होने का खतरा बना रहेगा। छत्तीसगढ़ में जल संचयन केवल योजना बनाने का नहीं बल्कि जमीन की सच्चाई को समझकर क्षेत्र विशेष के अनुसार समाधान तैयार करने का विषय है। अशोक चौधरी का यह विश्लेषण नीति निर्धारकों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि जल संरक्षण की राह पर आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक सोच और स्थानीय परिस्थितियों का सम्मान अनिवार्य है।


