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Monday, March 2, 2026
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Article : एक जिन शासन प्रेमीनवकार आराधक,,,,श्री जे.के.संघवी जी ,महामंत्र की प्रभावकारी घटना…

द्वि-शताब्दी नायक दादा गुरुदेव के अनन्य भक्त—एक ऐसा नाम, जो केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं त्रिस्तुतिक समाज की जीवंत पहचान है; परिषद परिवार की आत्मा है; और पुण्य सम्राट की अटूट आस्था का साकार प्रतीक है।जिसके संकल्पों ने धर्म की पताका को चहूँ ओर फहराया, जिसकी श्रद्धा ने विश्वास के शिखरों पर कीर्तिमान अंकित किए—वे हैं श्री जे के संघवी जी। उनका जीवन केवल साधारण जीवन नहीं, बल्कि नवकार की साधना से आलोकित एक दिव्य तपोगाथा है।


यह संस्मरण केवल एक घटना नहीं, बल्कि नवकार महामंत्र की चमत्कारिक महिमा का प्रत्यक्ष साक्ष्य है—एक ऐसा प्रसंग, जिसे सुनकर रोम-रोम श्रद्धा से पुलकित हो उठता है और आत्मा नवकार की शरण में नतमस्तक हो जाती है।राजस्थान की पावन धरा—आहोर! तप, त्याग और तितिक्षा से सिंचित वह पुण्यभूमि, जहाँ धर्म की सुगंध वायु में घुली रहती है। उसी पावन भूमि पर अभी अभी 9 फरवरी 2026 की रात्री 9 बजे जब श्री संघवी जी आहोर उपाश्रय में अन्य श्रावकों के साथ सायंकालीन प्रतिक्रमण कर के अपने एक मित्र महावीरजी गुंटूर वालो के साथ
जीवन का क्या भरोसा विषय पर चर्चा करते करते आहोर स्थित निवास पर लोट रहे थे कि एक विचित्र और विस्मयकारी दृश्य घटित हुआ।


एक महाबली बैल—जिसका शरीर पर्वत की भाँति विशाल और whose सींग वज्र की भाँति प्रचंड—अचानक पीछे से आया और संघवी जी की दुबली-पतली, तपस्वी काया को अपने दोनों सींगों के मध्य उठा लिया।
क्षणभर में समय जैसे ठहर गया*…
वातावरण स्तब्ध हो गया…
दर्शकों की श्वास थम गई…
वह दृश्य ऐसा था मानो मृत्यु स्वयं अपने बाहुपाश फैलाकर खड़ी हो।
परन्तु उस भयावह क्षण में भी संघवी जी का मन विचलित नहीं हुआ।
न कोई भय…
न कोई व्याकुलता…
न कोई हाहाकार…
उन्होंने शांत भाव से, अंतरात्मा की गहराइयों में उतरकर, समस्त जीवों से मन ही मन मिच्छामि दुक्कडम्” कर क्षमा याचना की—
और फिर पूर्ण समर्पण के साथ नवकार महामंत्र के ध्यान में लीन हो गए।
उनकी चेतना में केवल एक ही ध्वनि गूँज रही थी—
णमो अरिहंताणं…
णमो सिद्धाणं…
णमो आयरियाणं…
णमो उवज्झायाणं…
णमो लोए सव्व साहूणं…
और तभी…
एक ऐसा चमत्कार घटित हुआ, जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया।
वह प्रचंड, उग्र, महाबली बैल—जो विनाश का प्रतीक प्रतीत हो रहा था—अचानक शांत हो गया।
मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसके क्रोध को करुणा में परिवर्तित कर दिया हो।
उसने संघवी जी को अत्यंत सहजता और कोमलता से पुनः धरती पर सुरक्षित रख दिया—बिना किसी आघात, बिना किसी पीड़ा, बिना किसी क्षति के,जैसे माँ अपने बेटे को।
यह दृश्य देखकर प्रत्यक्षदर्शियों की आँखें विस्मय से फैल गईं…
स्वयं संघवी जी भी उस दिव्य अनुकंपा को अनुभव कर स्तब्ध रह गए।
जहाँ सामान्यतः एक हल्का स्पर्श भी प्राणघातक हो सकता था, वहाँ एक प्रचंड बैल द्वारा उठाए जाने पर भी संघवी जी को तनिक भी आघात नहीं पहुँचना—यह केवल संयोग नहीं था, यह नवकार महामंत्र की असीम कृपा और दिव्य संरक्षण का जीवंत प्रमाण था।
यह घटना स्पष्ट उद्घोष करती है कि

जब आत्मा नवकार में लीन हो जाती है,
जब श्रद्धा समर्पण में परिणत हो जाती है,
जब साधना जीवन का प्राण बन जाती है—
तब स्वयं प्रकृति भी रक्षक बन जाती है।
यह नवकार का प्रभाव है…
यह पूर्व जन्मों के पुण्यों का प्रतिफल है…
यह सेवा, सुश्रुषा, परोपकार और तप की पराकाष्ठा का प्रत्यक्ष फल है।
नवकार केवल एक मंत्र नहीं—
यह आत्मा का कवच है,
यह जीवन का रक्षक है,
यह मृत्यु के द्वार पर खड़ी आत्मा को भी अमरत्व का आश्वासन देता है।
संघवी जी का यह संस्मरण केवल एक घटना नहीं—
यह नवकार की महिमा का जीवंत घोष है,
यह श्रद्धा की विजय का उद्घोष है,
यह विश्वास की अमर गाथा है।
नतमस्तक है श्रद्धा…
वंदित है वह साधना…
और कोटिशः नमन है उस नवकार महामंत्र को—
जिसने अपने अनन्य भक्त को मृत्यु के मुख से भी सुरक्षित लौटा दिया।
नवकार की शरण में जो गया,
उसका सदा ही बेड़ा पार हुआ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

अर्चना जैन इंदौर,,,,,,,,,,,

*एक जिन शासन प्रेमी
नवकार आराधक,,,,
श्री जे.के.संघवी जी

महामंत्र की प्रभावकारी घटना

द्वि-शताब्दी नायक दादा गुरुदेव के अनन्य भक्त—एक ऐसा नाम, जो केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं त्रिस्तुतिक समाज की जीवंत पहचान है; परिषद परिवार की आत्मा है; और पुण्य सम्राट की अटूट आस्था का साकार प्रतीक है।जिसके संकल्पों ने धर्म की पताका को चहूँ ओर फहराया, जिसकी श्रद्धा ने विश्वास के शिखरों पर कीर्तिमान अंकित किए—वे हैं श्री जे के संघवी जी। उनका जीवन केवल साधारण जीवन नहीं, बल्कि नवकार की साधना से आलोकित एक दिव्य तपोगाथा है।यह संस्मरण केवल एक घटना नहीं, बल्कि नवकार महामंत्र की चमत्कारिक महिमा का प्रत्यक्ष साक्ष्य है—एक ऐसा प्रसंग, जिसे सुनकर रोम-रोम श्रद्धा से पुलकित हो उठता है और आत्मा नवकार की शरण में नतमस्तक हो जाती है।


राजस्थान की पावन धरा—आहोर! तप, त्याग और तितिक्षा से सिंचित वह पुण्यभूमि, जहाँ धर्म की सुगंध वायु में घुली रहती है। उसी पावन भूमि पर अभी अभी 9 फरवरी 2026 की रात्री 9 बजे जब श्री संघवी जी आहोर उपाश्रय में अन्य श्रावकों के साथ सायंकालीन प्रतिक्रमण कर के अपने एक मित्र महावीरजी गुंटूर वालो के साथजीवन का क्या भरोसा विषय पर चर्चा करते करते आहोर स्थित निवास पर लोट रहे थे कि एक विचित्र और विस्मयकारी दृश्य घटित हुआ।एक महाबली बैल—जिसका शरीर पर्वत की भाँति विशाल और whose सींग वज्र की भाँति प्रचंड—अचानक पीछे से आया और संघवी जी की दुबली-पतली, तपस्वी काया को अपने दोनों सींगों के मध्य उठा लिया।


क्षणभर में समय जैसे ठहर गया*…
वातावरण स्तब्ध हो गया…
दर्शकों की श्वास थम गई…
वह दृश्य ऐसा था मानो मृत्यु स्वयं अपने बाहुपाश फैलाकर खड़ी हो।परन्तु उस भयावह क्षण में भी संघवी जी का मन विचलित नहीं हुआ।
न कोई भय…
न कोई व्याकुलता…
न कोई हाहाकार…
उन्होंने शांत भाव से, अंतरात्मा की गहराइयों में उतरकर, समस्त जीवों से मन ही मन मिच्छामि दुक्कडम्” कर क्षमा याचना की—
और फिर पूर्ण समर्पण के साथ नवकार महामंत्र के ध्यान में लीन हो गए।
उनकी चेतना में केवल एक ही ध्वनि गूँज रही थी—
णमो अरिहंताणं…
णमो सिद्धाणं…
णमो आयरियाणं…
णमो उवज्झायाणं…
णमो लोए सव्व साहूणं…
और तभी…


एक ऐसा चमत्कार घटित हुआ, जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया।वह प्रचंड, उग्र, महाबली बैल—जो विनाश का प्रतीक प्रतीत हो रहा था—अचानक शांत हो गया।मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसके क्रोध को करुणा में परिवर्तित कर दिया हो।उसने संघवी जी को अत्यंत सहजता और कोमलता से पुनः धरती पर सुरक्षित रख दिया—बिना किसी आघात, बिना किसी पीड़ा, बिना किसी क्षति के,जैसे माँ अपने बेटे को।यह दृश्य देखकर प्रत्यक्षदर्शियों की आँखें विस्मय से फैल गईं…स्वयं संघवी जी भी उस दिव्य अनुकंपा को अनुभव कर स्तब्ध रह गए।
जहाँ सामान्यतः एक हल्का स्पर्श भी प्राणघातक हो सकता था, वहाँ एक प्रचंड बैल द्वारा उठाए जाने पर भी संघवी जी को तनिक भी आघात नहीं पहुँचना—यह केवल संयोग नहीं था, यह नवकार महामंत्र की असीम कृपा और दिव्य संरक्षण का जीवंत प्रमाण था।यह घटना स्पष्ट उद्घोष करती है कि

जब आत्मा नवकार में लीन हो जाती है,
जब श्रद्धा समर्पण में परिणत हो जाती है,
जब साधना जीवन का प्राण बन जाती है—
तब स्वयं प्रकृति भी रक्षक बन जाती है।
यह नवकार का प्रभाव है…
यह पूर्व जन्मों के पुण्यों का प्रतिफल है…
यह सेवा, सुश्रुषा, परोपकार और तप की पराकाष्ठा का प्रत्यक्ष फल है।
नवकार केवल एक मंत्र नहीं—
यह आत्मा का कवच है,
यह जीवन का रक्षक है,
यह मृत्यु के द्वार पर खड़ी आत्मा को भी अमरत्व का आश्वासन देता है।
संघवी जी का यह संस्मरण केवल एक घटना नहीं—
यह नवकार की महिमा का जीवंत घोष है,
यह श्रद्धा की विजय का उद्घोष है,
यह विश्वास की अमर गाथा है।
नतमस्तक है श्रद्धा…
वंदित है वह साधना…
और कोटिशः नमन है उस नवकार महामंत्र को—
जिसने अपने अनन्य भक्त को मृत्यु के मुख से भी सुरक्षित लौटा दिया।
नवकार की शरण में जो गया,
उसका सदा ही बेड़ा पार हुआ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

अर्चना जैन इंदौर,,,,,,,,,,,

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