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Monday, March 2, 2026
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मोरारिबापू: प्यारे और प्यारका वटवृक्ष


पूज्य मोरारिबापू आज महावद चौदस यानी शिवरात्रि के दिन अपने 81वें साल में कदम रख रहे हैं। ‘शतं जीवं नहिं सवा शतं’ उनके कामों से हर कोई यही कहता है! अपने जीवन के सात दशकों तक अपनी रगोको रामनाम की गूंजसे भरने वाली इस महान चेतना और परम शक्तिको शायद भविष्यमें लोग एक चमत्कारी महापुरुष के रूप में पहचानेंगे!!
पूज्य मोरारिबापू खुद अपने जन्म को लेकर कई बार घोषणा करते हैं कि मेरे पासपोर्ट में 25, सितंबर 1946 जन्म की तारीख लिखी है। लेकिन असलमें,उनका जन्मदिन शिवरात्रि यानी 2 मार्च 1946 है। वह शिवरात्रि का दिनथा और इसलिए बापूने कभीभी अपना जन्मदिन अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाबसे नहीं धोषित किया। इसलिए,शिवरात्रि को ही जन्म मानते हुए यह दिन शनिवार था, महावद सवंत 2002 का 14वीं का दिन। तो, महाशिवरात्रि से बापू का जन्मदिन गिनते हुए, बापू अब अपने 81वें साल में प्रवेश कर रहे हैं। उनके जन्मदिन पर, मैं इस महान चेतनाको बार-बार नमन और वंदन करता हूं।


यह एक सार्वजनिक तथ्य है कि बापूने सिर्फ 14 साल की उम्रमें अपने दादा और गुरु पूज्य त्रिभुवनदास बापूसे रामचरित मानसकी चौपाइयोंके गायनके साथ मानसिक दीक्षा ली थी। रामचरित मानसके दोहे, सोरठे और चौपाइयां धीरे-धीरे पु. मोरारिबापू की पूरी चेतनामें समा गईं और अपने पैतृक गांव और जन्मस्थान,भावनगरके महुवा तालुका के तलगाजरडामें,उन्होंने पहली बार एक वटकी छायामें सिर्फ दो श्रोताओं के सामने रामकथा प्रस्तुत की और फिर आज यह गंगा अप्रत्यक्ष रूपसे करोड़ों श्रोताओं तक पहुंच चुकी है।
पु .मोरारिबापू के लिए कुछ भी लिखना या उन्हें कोई ओपीनियन देना हिम्मत नहीं होती है, क्योंकि इस बात स्पष्ट हैं की कुछ शब्दोंमें उनकी पूरी पर्सनैलिटी को बताने, लिखने या पेश करनेसे ऐसा लगेगा कि कोई क्राइम हो गया है,क्योंकि अगर हम अपनी ज़िंदगी के 68 साल उस चेतनासे जोड़नेकी कोशिश करें जो रामको समर्पित रही है और हम उसे एक शब्द के पुष्पमें बांधने की कोशिश करें,तो क्या यह मुमकिन है?

राम की कहानी कथा रुप अब दुनिया के 700 करोड़ लोगों में से करीब 200 करोड़ हिंदी और गुजराती जानने वाले लोगों तक फैल चुकी है। शायद दुनिया के किसी और धर्ममें इतनी आसानी से ऐसी कहानी या कथा पेश की जाती हो और ऐसा सुनने में नहीं आया! लाखों लोग रोज़ हाथ लंबित करके, प्यासे, इन धाराओं को अपनी प्यास बुझाने के लिए खड़े हों!? लेकिन पूज्य बापू की बातें सुनने के लिए, न सिर्फ उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम भारत से ही बल्कि दुनिया के कोने-कोने से हज़ारों लोग बेसब्री से आंखें खोले बैठे हैं, पहले टीवी पर और अब इंटरनेट पर,आस्था चैनल के ज़रिए।

972वीं कथा बापूने अपनी परंपरा के दिव्य तत्व कृष्णम शरणम द्वारिकाको समर्पित करते हुए 81वें साल की शुरुआत की है। बापू न सिर्फ दुनिया के छह महाद्वीपों में इंसानों के रहने वाले और आसमान और पानी में सबको रामकथा का रस पिलाने का ज़रिया बन पाए हैं, बल्कि बापू के कदम दुर्गम जंगली इलाकों और एवरेस्ट जैसे बर्फीले हिमालय के पहाड़ों तक भी पहुंचे हैं, जहां मानसरोवर है। बापू ने कभी आस्था को अंधविश्वास में बदलने की कोशिश नहीं की, लेकिन मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूं कि जो लोग एक बार बापू की कहानियों और उनके रस का घूंट भर लेते हैं, वे हमेशा के लिए बंध जाते हैं। इसीलिए शायद इस चौपाई का गीत “आइये हनुमंत बिराजिए कथा कहुं रघुराय।” हनुमानजी महाराज को हमेशा कथा मंडप में लाने के लिए काफी है। आजभी 972 कथाओं में कोई ऐसी घटना नहीं हुई जो न तो दयालु हो और न ही दर्दनाक!
बापूका पवित्र,तरल जीवन ‘चरैवेति चरैवेति’ मंत्र की माला के मणकों की तरह लगातार दौड़ता,फैलता और बहता हुआ देखा गया है। लेकिन ऐसा कोई मौका नहीं आया जब उनकी सांस फूली हो।
पु.बापू लाखों लोगों की ज़िंदगी बदलनेकी वजह बने हैं और हम उनके जन्मदिन पर उन्हें बार-बार नमन करते हैं, उनसे यही कामना करते हैं कि वे इस गंगा का अभिषेक करते रहें।

Reporter : तखुभाई सांडसुर

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